बेंगलुरु, 1 नवंबर 2025:
कर्नाटक आज अपने गौरवशाली इतिहास के प्रतीक 70वें कन्नड़ राज्योत्सव को बड़े जोश और सम्मान के साथ मना रहा है। सुबह से ही राजधानी बेंगलुरु सहित पूरे राज्य में लाल-पीले झंडों की शोभा देखते ही बन रही थी। सरकारी भवनों, स्कूलों और सांस्कृतिक संस्थानों में कार्यक्रम आयोजित किए गए और “जय माँ भुवनेश्वरी” के जयघोष गूंज उठे।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य के लोगों को शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि कन्नड़ भाषा हमारी पहचान की आत्मा है, जो समाज को जोड़ती है और विविधता में एकता का संदेश देती है। उन्होंने कहा कि यह भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, इतिहास और अस्मिता की धरोहर है।
सिद्धारमैया ने आगे कहा कि राज्य के हर नागरिक को चाहिए कि वह दैनिक जीवन में कन्नड़ का प्रयोग करे, जिससे आने वाली पीढ़ियाँ भी इस समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ा सकें। “कन्नड़ बोलने, सोचने और व्यवहार में अपनाने का संकल्प आज के दिन लेना ही सच्चा राज्योत्सव है,” उन्होंने कहा।
उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार का संदेश
उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने इस अवसर पर अपने संदेश में कहा कि “सिरिगन्नादम गेल्गे, सिरिगन्नादम बाल्गे!” यानी “कन्नड़ अमर रहे, कन्नड़ खिलता रहे।”
उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपनी मातृभाषा को सम्मान दे और रोज़मर्रा के कामों में उसका प्रयोग बढ़ाए। “हमारी भाषा हमारी शक्ति है, इसे रोज़ जीने का प्रयास करें,” उन्होंने कहा।
🕊️ राज्यभर में जश्न और सांस्कृतिक आयोजन
कर्नाटक के सभी जिलों में आज उत्सव का माहौल है। बेंगलुरु के कांतीरवा स्टेडियम में मुख्य कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहाँ पारंपरिक नृत्य, ध्वजारोहण और राज्य गीत “जय भारत जननिय तನುजाते” की गूंज ने माहौल को भक्ति और गर्व से भर दिया।
कई स्कूलों में बच्चों ने कन्नड़ साहित्यकारों की कविताएँ प्रस्तुत कीं, जबकि कॉलेजों में वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ और निबंध लेखन जैसे कार्यक्रम हुए।
राजनीतिक हस्तियों के संदेश
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने ट्वीट करते हुए लिखा कि “कन्नड़ भूमि चंदन सी सुगंधित है, इसकी करुणा ही इसका सबसे बड़ा गौरव है।”
उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि कन्नड़ की मिट्टी, भाषा और परंपराओं को संजोएं और अगली पीढ़ी तक इसकी महक पहुँचाएं।
विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने भी कर्नाटक के एकीकरण आंदोलन में योगदान देने वाले वीरों को याद किया। उन्होंने कहा, “कन्नड़ की खुशबू हर घर में फैले, हर हृदय कन्नड़ से जुड़ा रहे।”
पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा ने भी बधाई संदेश में कहा कि कर्नाटक की कला, साहित्य और संस्कृति अद्वितीय हैं और इन्हें सहेजना हम सबका दायित्व है। “हमारी भाषा हमारी विरासत है — इसे संरक्षित रखना भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी है,” उन्होंने कहा।
कन्नड़ की आत्मा — एकता और संस्कृति
कन्नड़ भाषा का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। पम्पा, रन्ना, बसवन्ना से लेकर कुवेम्पु तक, अनेक महान संतों और कवियों ने इस भाषा को अपनी लेखनी से समृद्ध किया।
राज्योत्सव सिर्फ़ एक उत्सव नहीं बल्कि यह दिन कन्नड़ नाडु की अस्मिता, सम्मान और एकता का प्रतीक है।
“जय माँ भुवनेश्वरी” की गूंज
शहरों से लेकर गाँवों तक मंदिरों, सरकारी भवनों और सड़कों पर “जय माँ भुवनेश्वरी” की गूंज सुनाई दी।
लोगों ने लाल-पीले झंडे लहराए और एक-दूसरे को मिठाई बाँटकर राज्योत्सव की शुभकामनाएँ दीं।
सिद्धारमैया सरकार ने राज्य के सभी जिलों में झंडारोहण समारोहों का आयोजन कर कन्नड़ गौरव दिवस का व्यापक संदेश दिया।
कन्नड़ राज्योत्सव केवल भाषाई उत्सव नहीं, बल्कि यह दिन कर्नाटक की आत्मा, संस्कृति और भावनाओं का उत्सव है।
इस अवसर पर पूरे राज्य ने एक बार फिर साबित किया कि भाषा चाहे पुरानी हो, पर उसकी भावना हमेशा नई रहती है।
“जय माँ भुवनेश्वरी — सिरिगन्नादम गेल्गे, सिरिगन्नादम बाल्गे!”





