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Bosch करेगी 13,000 लोगों की छंटनी, ऑटो मार्केट की मंदी बनी वजह”

बर्लिन | 25 सितंबर 2025

यूरोप-जर्मनी की जानी-मानी कंपनी Robert Bosch, जो दुनिया की सबसे बड़ी ऑटो पार्ट्स सप्लायर मानी जाती है, ने बड़ा ऐलान किया है। कंपनी ने कहा है कि वह 13,000 नौकरियां खत्म करने जा रही है।

कारण वही, ऑटो मार्केट में सुस्ती, बढ़ती लागत और कड़ी प्रतिस्पर्धा। कंपनी का कहना है कि फिलहाल उसके सामने सालाना 2.5 बिलियन यूरो (करीब 2.9 बिलियन डॉलर) का खर्चा अंतर है, जिसे कम करना बेहद जरूरी है।

खर्च घटाने की बड़ी प्लानिंग बोस्च कंपनी की

Bosch ने साफ कर दिया है कि सिर्फ़ नौकरी कटौती ही नहीं, बल्कि वह कई और मोर्चों पर खर्च कम करने जा रही है। इसमें शामिल हैं,

प्रोडक्शन मटेरियल और ऑपरेटिंग कॉस्ट घटाना

नई बिल्डिंग और फैसिलिटीज़ में निवेश कम करना

लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन को छोटा करना

2030 तक होगी छंटनी

कंपनी ने बताया कि जर्मनी के अलग-अलग लोकेशंस पर अलग-अलग टाइमलाइन में नौकरियां घटाई जाएंगी और यह प्रक्रिया 2030 तक जारी रहेगी। प्रशासन, सेल्स, डिवेलपमेंट और प्रोडक्शन जैसे डिपार्टमेंट्स में लंबे समय से ओवरकैपेसिटी बनी हुई है, खासकर डिमांड कम होने की वजह से।

“कठिन लेकिन ज़रूरी फैसला”

Bosch बोर्ड के सदस्य स्टेफन ग्रोश ने कहा:

“हमें मोबिलिटी सेक्टर में अपनी प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ानी है और लगातार लागत कम करनी है। यह बहुत दर्दनाक है, लेकिन हमारे पास कोई और विकल्प नहीं है।”

कंपनी के सीईओ स्टेफन हार्टुंग ने भी पहले कहा था कि 2025 में Bosch की रेवेन्यू सिर्फ़ करीब 2% बढ़ने की उम्मीद है।

418,000 कर्मचारियों वाली कंपनी

पिछले साल Bosch के पास दुनियाभर में लगभग 418,000 कर्मचारी थे। अब 13,000 लोगों की छंटनी का असर ऑटो इंडस्ट्री में बड़ा झटका माना जा रहा है।

ट्रेड वार से भी दबाव

हालांकि अमेरिका और यूरोप के बीच हाल ही में ट्रेड एग्रीमेंट हुआ है, जिससे EU ऑटो और ऑटो पार्ट्स पर टैरिफ 15% तक कम कर दिया गया है। लेकिन जर्मनी की कार इंडस्ट्री एसोसिएशन VDA का कहना है कि बाकी ट्रेड बैरियर्स अभी भी चुनौती बने हुए हैं।

Bosch बोर्ड के एक और सदस्य मार्कस हेन ने कहा:

“जियोपॉलिटिकल हालात और टैरिफ जैसी पाबंदियां बहुत अनिश्चितता पैदा कर रही हैं। हमें भी बाकी कंपनियों की तरह इससे निपटना होगा। आगे कॉम्पटीशन और ज्यादा तेज़ होने वाला है।”

Bosch की यह छंटनी सिर्फ़ कंपनी नहीं, बल्कि पूरे यूरोप की ऑटो इंडस्ट्री पर दबाव का साफ संकेत है।

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