Polio Awareness

भारत का पोलियो मुक्त सफर: जनसहयोग और जागरूकता की मिसाल

Updated: 11 नवंबर 2025 | Author: Hindinewser Desk

पोलियो उन्मूलन की यात्रा: कैसे भारत ने एक अदृश्य दुश्मन को हराया

कुछ दशक पहले तक पोलियो का नाम सुनते ही लोगों के मन में डर बैठ जाता था। यह बीमारी बच्चों को जीवनभर के लिए अपंग बना देती थी। पर भारत ने इस चुनौती को मात देने का जो इतिहास रचा, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गया है।

पोलियो: बीमारी नहीं, सामाजिक चेतना की परीक्षा

पोलियो एक वायरस से फैलने वाला संक्रमण है, जो मुख्यतः दूषित पानी या भोजन के ज़रिये शरीर में प्रवेश करता है। यह रोग तंत्रिका तंत्र पर असर डालकर हाथ-पैरों की मांसपेशियों को कमजोर करता है। कई मामलों में यह स्थायी विकलांगता का कारण बनता है। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में पोलियो को समाप्त करना एक असंभव-सा लक्ष्य था — लेकिन जनसहयोग ने इसे मुमकिन बना दिया।

सरकार और समाज की संयुक्त मुहिम

1990 के दशक में केंद्र सरकार ने पोलियो उन्मूलन अभियान की शुरुआत की। “दो बूंद जिंदगी की” यह नारा हर गांव और हर घर तक पहुँचा। स्वास्थ्यकर्मियों, आशा कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों ने लाखों किलोमीटर का सफर तय किया। चाहे बारिश हो या धूप — हर बच्चे तक वैक्सीन पहुँचना ही उनका लक्ष्य था।

धीरे-धीरे परिणाम दिखने लगे। 2000 के बाद पोलियो के मामलों में तेज़ी से गिरावट आई, और 2011 में भारत ने आखिरी पोलियो केस दर्ज किया। तीन साल तक लगातार कोई नया मामला न मिलने के बाद, 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भारत को “पोलियो मुक्त देश” घोषित किया।

सफलता के पीछे छिपी चुनौतियाँ

पोलियो अभियान को लेकर शुरू में कई अफवाहें फैलीं। कुछ इलाकों में लोगों ने टीकाकरण से इनकार भी किया। लेकिन डॉक्टरों, सामाजिक संस्थाओं और धार्मिक नेताओं ने मिलकर जागरूकता बढ़ाई। जब लोगों को समझ आया कि यह बच्चों की सुरक्षा का सवाल है, तब पोलियो के खिलाफ लड़ाई ने राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले लिया।

अभी भी ज़रूरत है सतर्कता की

भारत आज भले ही पोलियो मुक्त है, लेकिन यह जीत स्थायी तभी रहेगी जब हम लापरवाही न करें। पड़ोसी देशों में अब भी पोलियो के मामले सामने आते हैं। इसलिए भारत हर साल राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस के मौके पर बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाने का अभियान जारी रखता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक पूरी दुनिया पोलियो मुक्त नहीं होती, तब तक सतर्कता बनाए रखना बेहद जरूरी है। यह केवल एक बीमारी से लड़ाई नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।


निष्कर्ष: पोलियो उन्मूलन की कहानी यह बताती है कि जब सरकार, समाज और नागरिक एक साथ काम करते हैं, तब असंभव भी संभव हो जाता है। आने वाले वर्षों में भी हमें यही सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बच्चा “दो बूंद जिंदगी की” से वंचित न रहे।
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